आईडीबीआई बैंक की बिक्री या राष्ट्रीय संपत्ति का अवमूल्यन?

आईडीबीआई बैंक के रणनीतिक विनिवेश की प्रक्रिया एक बार फिर अंतिम चरण में पहुँचती दिखाई दे रही है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार कनाडा की फेयरफैक्स फाइनेंशियल होल्डिंग्स द्वारा संशोधित वित्तीय बोली प्रस्तुत किए जाने के बाद केंद्र सरकार सौदे को शीघ्र पूरा करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया के बीच एक ऐसा प्रश्न है, जिसका उत्तर देश जानना चाहता है—क्या सरकार एक मजबूत और लाभकारी सार्वजनिक बैंक का उचित मूल्य प्राप्त किए बिना उसका नियंत्रण निजी, संभवतः विदेशी, हाथों में सौंपने जा रही है?

समाचारों के अनुसार इस वर्ष प्रारम्भ में प्राप्त वित्तीय बोलियाँ सरकार द्वारा निर्धारित आरक्षित मूल्य ₹90000 करोड़ से कम थीं। इसी कारण विनिवेश प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी। अब संशोधित बोली ₹ 53000 करोड़ लगभग पर विचार किया जा रहा है। जबकि आज आईडीबीआई बैंक का बाज़ार पूंजीकरण लगभग ₹93570 करोड़ है। यदि वही खरीदार अब भी प्रक्रिया में हैं, तो स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि सरकार ने अपेक्षित कीमत क्यों कम कर दी है?

यह केवल एक कारोबारी निर्णय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय संपत्ति के मूल्यांकन का प्रश्न है। सार्वजनिक संपत्तियों का विनिवेश केवल बिक्री नहीं, बल्कि जनता की संपत्ति के संरक्षण की संवैधानिक जिम्मेदारी से जुड़ा प्रश्न भी है। इसमें पूर्ण पारदर्शिता अपेक्षित है। 

यह प्रश्न इसलिए और महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि आईडीबीआई बैंक आज किसी संकटग्रस्त संस्था का नाम नहीं है। इसके विपरीत, यह देश के सबसे तेज़ी से पुनर्जीवित हुए बैंकों में शामिल है।

31 मार्च 2026 को समाप्त वित्तीय वर्ष में बैंक ने ₹9,513 करोड़ का अब तक का सर्वाधिक शुद्ध लाभ अर्जित किया। बैंक की कुल जमा राशि लगभग ₹3.47 लाख करोड़, शुद्ध अग्रिम ₹2.54 लाख करोड़ तथा कुल व्यवसाय ₹6 लाख करोड़ से अधिक हो चुका है। बैंक का नेट एनपीए केवल 0.15 प्रतिशत रह गया है, जबकि पूंजी पर्याप्तता अनुपात  26.65 प्रतिशत है, जो नियामकीय आवश्यकता से कहीं अधिक है।

कुछ वर्ष पहले जिस बैंक को भारी एनपीए के कारण संकटग्रस्त माना जाता था, उसी बैंक को उसके कर्मचारियों और प्रबंधन ने उल्लेखनीय रूप से पुनर्जीवित कर देश के सबसे सुदृढ़ बैंकों की श्रेणी में ला खड़ा किया है। बैंक के अधिकारी, कर्मचारी और उनके संगठन इस विनिवेश के खिलाफ़ लगातार लामबंद हैं।

आईडीबीआई बैंक का महत्व केवल उसकी लाभप्रदता तक सीमित नहीं है। भारतीय वित्तीय प्रणाली की अनेक प्रमुख संस्थाओं—सेबी, एनएसई, एनएसडीएल, सिडबी और एक्सिम बैंक—के विकास में इसकी ऐतिहासिक भूमिका रही है। यह केवल एक बैंक नहीं, बल्कि भारत की विकास वित्त व्यवस्था की एक महत्वपूर्ण संस्था है।

सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि जब आईडीबीआई बैंक अपने इतिहास के सर्वश्रेष्ठ वित्तीय प्रदर्शन के दौर में है, तब उसके निजीकरण की ऐसी क्या अनिवार्यता है? क्या राष्ट्र की इस महत्वपूर्ण परिसंपत्ति का वास्तविक मूल्य देश को मिल रहा है?

सार्वजनिक क्षेत्र की संस्थाएँ अंततः देश की सामूहिक संपत्ति हैं। किसी भी लोकतांत्रिक सरकार से यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि वह ऐसी संपत्तियों के संबंध में पूर्ण पारदर्शिता बरते और राष्ट्रीय हित को सर्वोच्च प्राथमिकता दे।

(अरविंद पोरवाल की रिपोर्ट। पोरवाल एमपी बैंक ऑफ़िसर्स एसोसिएशन के महासचिव हैं।)

Leave a Reply